महर्षि बाल्मीकि जी

जो की रामायण के रचयिता थे वाल्मीकि जयंती अर्थात  एक ऐसा दिन जब महान रचियता बाल्मीकि जी का जन्म हुआ, इनकी महान रचना से हमें महाग्रंथ रामायण का सुख मिला यह एक ऐसा ग्रंथ है जिसने मर्यादा सत्य प्रेम मित्रता एवं सेवक के धर्म की परिभाषा सिखाई, वाल्मीकि जी के जीवन से बहुत कुछ सीखने को मिलता है  उनका व्यक्तित्व साधारण नहीं था उन्होंने अपने जीवन की एक घटना से प्रेरित होकर अपना जीवन पथ बदल दिया जिसके फलस्वरूप में महान पूजनीय कवियों में से एक बने यही चरित्र उन्हें महान बनाता है और हमें उनसे सीखने के प्रति प्रेरित करता है

भगवान वाल्मीकि जी के बारे 6 तथ्य

भगवान वाल्मीकि जी के नाम के साथ दशकों से जुड़े डाकू शब्द की कंट्रोवर्सी अब खत्म हो गई है। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने पटियाला की पंजाबी यूनिवर्सिटी की महाऋषि वाल्मीकि चेयर की पूर्व चेयरपर्सन डॉ. मंजुला सहदेव द्वारा पेश किए गए तथ्यों के आधार पर मीडिया को भविष्य में वाल्मीकि भगवान के नाम के साथ डाकू शब्द  न लगाने के आदेश दिए हैं।

2010 में एक टीवी चैनल के एक सीरियल में भगवान वाल्मीकि जी को डाकू के रूप में दिखाया गया था। इस पर जालंधर के नव विकास ने चैनल पर पुलिस केस दर्ज करके हाईकोर्ट में याचिका दायर की। इस याचिका में डॉ. मंजुला सहदेव की रिसर्च के आधार पर यह दावा किया गया कि महाऋषि वाल्मीकि अपने जीवन में डाकू थे ही नहीं, वाल्मीकि भगवान पर रिसर्च करने के लिए पंजाब सरकार की ओर से 1995 में पंजाबी यूनिवर्सिटी में कायम की गई महाऋषि वाल्मीकि चेयर की पहली चेयरपर्सन डॉ. मंजुला सहदेव ने वाल्मीकि रामायण संस्कृति नाटकों में राम विषय पर पीएचडी की है। उनके द्वारा सभी शास्त्रों, वेदों का अध्ययन करने के बाद पंजाबी यूनिवर्सिटी ने उनके द्वारा वाल्मीकि भगवान पर लिखी किताब महाऋषि वाल्मीकि-एक समीक्षात्मक अध्ययन को छापा था।

  1. वैदिक लिटरेचर से लेकर 9वीं शताब्दी एडी तक कोई रेफरेंस प्राप्त नहीं होता जो यह साबित कर सके कि वाल्मीकि जी डाकू थे।
  2. 9वींशताब्दीमें इनके नाम वाल्मीकि के शाब्दिक अर्थ वाल्मीकि (दीमक की बांबी) की उत्पति का जिक्र भी कहीं नहीं मिलता।
  3. वाल्मीकि रामायण में उन्हें भगवान, मुनि, ऋषि, महाऋषि कहा गया है। उनके अपने महाकाव्य में भी डाकू होने का कोई उल्लेख नहीं है।
  4. पहला रेफरेंस सिकंद पुराण में मिलता है जो विद्वानों के मुताबिक 10वीं शताब्दी का है। 10वीं शताब्दी से पहले जब वाल्मीकि रामायण का 9 दिन का पाठ चलता था तो उसे शुरू करने से पहले भगवान वाल्मीकि की पूजा होती थी
  5. अगला रेफरेंस मरा मरा आध्यात्मिक रामायण में मिलता है जो 15वीं शताब्दी की है। उसके बाद आनंद रामायण मिलती है जो 16वीं शताब्दी की है।
  6. भक्ति आंदोलन साउथ में 8वीं और 9वीं शताब्दी में शुरू हुए। 13वीं से 16वीं शताब्दी में भक्तिधारा अपने चरम पर रही, उसी समय वाल्मीकि जी के बारे में यह कथाएं बुननी शुरू हुईं।

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क्या है कहानी

माना जाता है की महर्षि वाल्मीकि जी एक डाकू थे महर्षि वाल्मीकि जी का नाम रतनाकर था और उनका पालनपोषण  जंगल में रहने वाली भील जाति में हुआ था जिस कारण उन्होंने भीलो की परंपरा को अपनाया और आजीविका के लिए डाकू बन गए अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए वह  राहगीरों को लूटते थे एवं जरूरत होने पर उन्हें मार भी देते थे इस प्रकार वह दिन-प्रतिदिन अपने पापों का घड़ा भर रहे थे एक दिन उनके जंगल से नारद मुनि गुजर रहे थे उन्हें देख रतनाकर ने  उन्हें बंदी बना लिया, रत्नाकर ने कहा जो भी मुसाफिर यहाँ से होकर जाता है मैं उसे लूट कर उसकी हत्या कर देता हूँ नारद मुनि ने रतनाकर से सवाल किया तुम ऐसे पाप क्यों कर रहे हो तो  

यह बात सुनकर रत्नाकर ने कहा की तुम्हारी नजर में एक राजा भी तो युद्ध में दुश्मनों के हजारों सैनिकों को मरवा देता है जब राजा का वह कर्म पाप नहीं कहलाता जो मेरे द्वारा की हुई हत्या पाप  कैसे हो सकती है देवर्षि नारद जी ने डाकू रत्नाकर की यह बात सुनकर कहा कि तुम पाप कर रहे हो या नहीं इसका निर्णय तो वही कर सकते हैं जिनका तुम अपनी पाप की कमाई से पालन पोषण कर रहे हैं जाओ अपने घर जाकर इस बात का पता करो कि क्या तुम्हारे पिता पत्नी और पुत्र तुम्हारे ईस पाप मैं तुम्हारे साथ हैं या नहीं यदि वह सभी तुम्हारे इस पाप में तुम्हारे साथ हैं तो मैं भी यह मान लूंगा कि तुम यह पाप नहीं कर रहे देवर्षि नारद की  यह बात सुनकर डाकू रत्नाकर अपने घर पहुंच कर सबसे पहले अपनी पत्नी से कहा कि तुम्हारे पालन पोषण के लिए मैं जो कार्य कर रहा हूं,यदि वह पाप है तो क्या तुम इस पाप में मेरी भागीदार हो यह बात सुनकर उसकी पत्नी ने कहा स्वामी  मैंने आपके सुख-दुख में आपका साथ देने की कसम खाई है आपके पाप में भागीदार बनने  की नहीं,  पत्नी की बात सुनकर डाकू रत्नाकर स्तब्द रह गया इसके बाद रतनाकर अपने अंधे पिता के पास गया ओर कहा की पिताजी  मैं आपके भरण पोषण के लिए जो कार्य करता हूँ यदि वह पाप है तो क्या आप इस पाप मैं  मेरे  भागीदार हैं उसके पिता बोले बेटा यह बात तो तेरी कमाई है इसे मैं कैसे बाँट सकता हूँ पिता की यह बात सुन कर रत्नाकर पर बिजली जैसे गिर गयी ओर फिर रत्नाकर देवर्षि नारद के पास गए ओर उनके पाँव मैं गिर कर उनसे माफी मांगने लगे तो नारद ने कहा की रत्नाकर इंसान स्वयं ही अपना शत्रु होता है ओर स्वयं ही अपना मित्रा भी होता है तुमने शत्रु मैं अपने पुराने संसार की रचना स्वयं की है ओर अब मित्र रूप मैं भी अपने नए संसार की रचना भी स्वयं करोगे,

इस घटना के बाद डाकू रत्नाकर जीवन पूरा बादल गया उसने पाप के मार्ग को त्याग कर पुण्य के मार्ग को अपना लिया ओर आगे चल कर यही डाकू रत्नाकर रामायण के रचियाता महर्षि वाल्मीकि बन गए |

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