NPS राष्ट्रीय पेंशन योजना क्या है? सरल शब्दों में भ्रांतियों का स्पष्टीकरण

साथियों! नई पेंशन योजना के स्वरूप और विशेषताओं पर चर्चा करने के बाद आज पुरानी पेंशन योजना के सापेक्ष इसकी खामियों तथा सरकार द्वारा इसे लागू करने के पीछे के तर्कों व हितों पर चर्चा करते हैं।

पारिभाषित लाभ पेंशन योजना (DBPS / DBS) वास्तव में है क्या?

पारिभाषित लाभ पेंशन योजना एक ऐसा पेंशन प्लान है जिसमें कर्मचारी के सेवानिवृत्त होने पर उसके अन्तिम वेतन, सेवा अवधि तथा आयु के पूर्वनिर्धारित फॅार्मूले के आधार पर उसे निश्चित मासिक पेंशन लाभ दिया जाता है। चूँकि कर्मचारी को मिलने वाला यह मासिक लाभ पहले से ही निश्चित होता है और ग्राहक द्वारा व्यक्तिगत निवेश पर मिलने वाले रिटर्न पर निर्भर नहीं करता इसीलिए इस योजना को पारिभाषित लाभ योजना (Defined Benefit Scheme) कहा जाता है।

इस पेंशन योजना में ग्राहक को भविष्य में भी मंहगाई भत्ते का लाभ मिलता रहता है जबकि एनपीएस में ग्राहक द्वारा एन्यूटी में 40% पेंशन फंड के निवेश से प्रतिमाह मिलने वाला पेंशन लाभ अन्त तक फिक्स रहेगा।

डीबीपीएस को बन्द करने के पीछे सरकार का क्या तर्क है और वास्तविकता क्या है?

भारत सरकार ने 22 दिसंबर, 2003 को एक नोटिफिकेशन जारी कर डीबीपीएस और जीपीएफ सुविधा को इस तर्क के साथ बन्द कर दिया कि बढ़ते पेंशन खर्च के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था इस पेंशन योजना का भार अब और नहीं सह पाएगी। दरअसल सरकार ने वही दोहराया जो आईएमएफ की वर्ष 2001 की रिपोर्ट लिखा गया था। सरकार का मानना था कि यदि इस पेंशन योजना को आगे जारी रखा गया तो यह देश की सभी सरकारों को दिवालिया बना देगी।

चलिए देखते हैं कि सरकार के इस तर्क में कितना दम है –

भारत में डीबीएस पर होने वाला खर्च जीडीपी का 0.1% से भी कम है जो कि बहुत कम है।

दक्षिण कोरिया और हांगकांग अपनी जीडीपी का 2% डीबीएस पर खर्च करते हैं।

जापान में यह 9% तथा इटली में 14% है।

फ्रांस और जर्मनी अपनी जीडीपी का 12% इसी मद में खर्च करते हैं।

….तो भारत सरकार के इस तर्क पर आश्चर्य होता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था “पारिभाषित लाभ पेंशन योजना” का बोझ नहीं उठा पाएगी।

कुछ सवाल?

क्या छोटे पेंशनरों को केवल इसलिए अनिश्चितता के अंधेरे में धकेला जा रहा है क्योंकि सरकार के पास पुरानी पेंशन योजना के बढ़ते खर्च से निपटने के लिए कोई और विकल्प नहीं है?

चूँकि पारिभाषित अंशदान पेंशन योजना को लागू करने के पीछे आईएमएफ की वर्ष 2001 की वह रिपोर्ट है जिसमें विभिन्न देशों की सरकारों को डीबीएस को बन्द कर डीसीएस(NPS) लागू करने की सलाह दी गई है, क्या वैश्विक बाजार का कोई नैतिक दायित्व नहीं बनता कि वह सेवानिवृत्ति के पश्चात अपने नागरिकों को शेष जीवन को गरिमा के साथ जीने के अधिकार को सम्मान दे?

यदि सरकार को ये लगता है कि पुरानी पेंशन योजना के मुकाबले नई पेंशन योजना में बेहतर रिटर्न मिलेगा तो क्यों सरकार ने सशस्त्र बलों को इस योजना से बाहर रखा है?

सशस्त्र बल देश के सबसे महत्वपूर्ण कर्मचारी हैं। उनको इस योजना से बाहर रखा जाना कहीं ना कहीं यह संशय पैदा करता है कि स्वयं सरकार को भी यह भरोसा नहीं है कि एनपीएस अपने ग्राहकों को बेहतर सुरक्षा और लाभ दे पाएगी।

एनपीएस को लागू करने के पीछे सरकार की वास्तविक सोच क्या है?

इस विषय पर ज्यादा शोध करने की आवश्यकता नहीं है। एनपीएस के बहाने सरकार अंशदान से एकत्रित फंड को पिछले दरवाजे से निकालकर अपनी बीमार पड़ी इकाइयों के इलाज में लगाएगी जबकि फंड पर रिटर्न का उत्तरदायित्व ना तो सरकार का होगा और ना ही एनपीएस ट्रस्ट (पीएफआरडीए) का।

डीबीएस में कर्मचारी को एक निश्चित पेंशन लाभ देने का उत्तरदायित्व नियोक्ता/सरकार का होता है। एनपीएस को लागू कर सरकार नियोक्ता को और स्वयं को इस जवाबदेही से मुक्त करना चाहते हैं।

कर्मचारी के नजरिये से क्या हैं एनपीएस की बड़ी खामियां?

इस योजना की सबसे बड़ी खामी तो यही है कि कर्मचारी के पेंशन फंड पर मिलने वाला रिटर्न इक्विटी, कॅार्पोरेट बॅान्ड्स व सरकारी बॅान्ड्स की परफॅार्मेंस पर निर्भर करेगा अर्थात हमेशा बेहतर रिटर्न की कोई गारंटी नहीं होगी और निवेश किया गया फन्ड डूब भी सकता है।

इस योजना में कर्मचारी को आवश्यकता पड़ने पर अपने पेंशन फंड को निकालने की आजादी नहीं है जबकि पुरानी व्यवस्था में कर्मचारी अपने जीपीएफ कोष का इस्तेमाल पूरी आजादी के साथ कर सकता है।

यह योजना EET टैक्स संरचना पर आधारित है अर्थात इसमें अंशदान और निवेश पर टैक्स में राहत दी गई है किन्तु निकासी पर कोई राहत नहीं दी गई है फिर चाहे वह 60 वर्ष की आयु पर 60% फंड का एकमुश्त भुगतान हो या फिर 70 वर्ष की आयु पर एन्यूटी का एकमुश्त भुगतान हो।

कर्मचारी को उसके पेंशन फंड पर मिलने वाला रिटर्न पूर्ण रूप से फंड वाला रिटर्न पूर्ण रूप से फंड मैनेजर की कार्यकुशलता और विवेक पर निर्भर करेगा। ग्राहक विशेषरूप से सरकारी कर्मचारी के पास ज्यादा कुछ करने का विकल्प नहीं होगा।

परिपक्वता पर अपने पेंशन फंड का 40% किसी जीवन बीमा कंपनी की एन्यूटी में निवेश करने पर मिलने वाला मासिक लाभ अन्त तक फिक्स रहेगा जबकि पुरानी व्यवस्था में पेंशन पर मंहगाई भत्ते का भी लाभ मिलता है।

….तो साथियों इन सभी बिन्दुओं पर सम्यक विश्लेषण की आवश्यकता है।

हमारे ऊपर एक ऐसी पेंशन व्यवस्था को थोपा जा रहा है जिसमें दूर दूर तक असुरक्षा और अनिश्चितता ही दिखाई देती है।

क्या आप ऐसी पेंशन व्यवस्था को स्वीकार करना पसंद करेंगे?

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